कर्पूर मंजरी - सट्टक भारतेंदु हरिश्चंद्र दोहा भरित नेह नव नीर नित, बरसत सुरस अथोर। जयति अपूरब घन कोऊ, लखि नाचत मन मोर । (सूत्रधार आता है) सूत्रधार : (घूमकर) हैं क्या हमारे नट लोग गाने बजाने लगे? यह देखो कोई सखी कपड़े चुनती है, कोई माला गूंधती है, कोई परदे बांधती है, कोई चन्दन घिसती है; यह देखो बंसी निकली, यह बीन की खोल उतरी, यह मृदंग मिलाए गए, यह मंजीरा झनका, यह धुरपद गाया गया। (कुछ ठहर कर) किसी को बुलाकर पूछे तो (नेपथ्य की ओर देख कर) अरे कोई है? पारिपाश्र्वक आता है। पारि. : कहो, क्या आज्ञा है? सूत्र. : (सोच कर) क्या खेलने की तैयारी हुई? पारि. : हां, आज सट्टक न खेलना है। सूत्र. : किस का बनाया? पारि. : राज्य की शोभा के साथ अंगों की शोभा का; और राजाओं में बड़े दानी का अनुवाद किया। सूत्र. : (विचार कर) यह तो कोई कूट सा मालूम पड़ता है (प्रगट) हां हां राजशेखर का और हरिश्चन्द्र का। पारि. : हां, उन्हीं का। सूत्र. : ठीक है, सट्टक में यद्यपि विष्कम्भक प्रवेशक नहीं होते तब भी यह नाटकों में अच्छा होता है। (सोच कर) तो भला कवि ने इस को संस्कृत ही में क्यों न बनाया, प्राकृत में क्यों बनाया? पारि...
Comments
और ...फिर
एक नयी अच्छी सी पोस्ट का
इंतजार करना है .
A Silent Silence : Shamma jali sirf ek raat..(शम्मा जली सिर्फ एक रात..)
Banned Area News : Rare book on political and economic history of India digitized