कब कहां और कैसे
कब कहां और कैसे काग़ज़ की एक कश्ती पानी में कुछ यूं चली लोगों ने कहा क्या खूब बढ़ी.. फिर न जाने किस सैलाब में बह गई कब कहां और कैसे.. एक छोटा दीया था कुटिया को रोशन किया करता था अपनो के लिए जीया करता था फिर न जाने किस तूफान में बुझ गया कब कहा और कैसे एक नन्हा बूटा था अपने बगीचे में रहता था खूब खुशबू देता था सब को अच्छा लगता था फिर न जाने किस आंधी मे टूट गया कब कहा और कैसे एक प्रेमी जोड़ा था बहुत खुश रहता था एक दूसरे के साथ चल था फिर न जाने किस मोड़ पे मुड़ गया कब कहा और कैसे...