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कब कहां और कैसे

कब कहां और कैसे काग़ज़ की एक कश्ती पानी में कुछ यूं चली लोगों ने कहा क्या खूब बढ़ी.. फिर न जाने किस सैलाब में बह गई कब कहां और कैसे.. एक छोटा दीया था कुटिया को रोशन किया करता था अपनो के लिए जीया करता था फिर न जाने किस तूफान में बुझ गया कब कहा और कैसे एक नन्हा बूटा था अपने बगीचे में रहता था खूब खुशबू देता था सब को अच्छा लगता था फिर न जाने किस आंधी मे टूट गया कब कहा और कैसे एक प्रेमी जोड़ा था बहुत खुश रहता था एक दूसरे के साथ चल था फिर न जाने किस मोड़ पे मुड़ गया कब कहा और कैसे...

कभी मन अकेला लगे

कभी मन अकेला लगे कभी नैन किसे ढ़ूढ़े कभी लब कुछ कहें कभी तलाश किसी की न जाने क्यों भटक रहा दिल न जाने क्यों बहक रहा दिल डर है कुछ हो न जाए जुदा हम से तू हो न जाए.. वो पल ज़िन्दगी का वो पल दिल्लगी का वो पल हसरतों का एक पल में टूट न जाए... मन डरे मन सहमे कभी मन अकेला लगे

छछुंदर के सर पर चमेली का तेल

छछुंदर के सर पर चमेली का तेल हालत देश की हुई बुरी ग़रीबी मंहगाई खूब बढ़ी।। चर्चा हो गया ये आम मेहनत का मिलता नहीं कोई दाम ।। चापलूसों ने किया देश का बंटाधार निकम्मो के सिर पर पहना कर ताज।। समझ में नहीं आता ये सारा खेल क्यों लगता है हमेशा छछुंदर के सर पर चमेली का तेल।।

आंधी

एक आंधी कुछ इस तरह से आती है साथ अपने गर्द और राख लाती है पीछे अपने अंधकार और मातम छोड़ जाती है जिसने देखा वो थर्ऱा गया जिसने सुना वो कांप गया जो गया वो लौट कर न आया जो बचा वो लौट कर जा न सका उस मंज़र को शब्दों मे बयां कैसे करूं उस रात को कलम से कैसे लिखूं रोने की आवाज़े शोर में खो गईं चीख पुकारे हवाओं मे उड गई वो आंधी इस बार सब कुछ ले गई

अकसर सोचता हूं।।

अकसर सोचता हूं इससे पहले की हम बेवाफा हो जाए क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाए।। बंदगी छोड़ दी हमने ऐ फराज़ क्या करें लोग जब खुदा हो जाए।। शमां हूं फूल हूं या रेत पर कदमों के निशान आप को हक है मुझे जो चाहे कहे ले।। सांस भरने को तो जीना नहीं कहते या रब दिल ही दुखता है न अब आस के दर होती है जैसे जागी हुई आंखों में चुबन कांच के खव्वाब रात इस तरह दिवानो की बसर होती है ।। गम ही दुशमन मेरा ग़म को ही दिल ढूढ़ता है एक लम्हे की जुदाई भी अगर होती है।.।