दर्पण... एक पत्रकार का सच
एक पत्रकार की चाहत...... दर्पण.... उस दर्पण पर सर्मपित मैं जो है हर भाव से परिचित देखे जो खिलखिलाते चेहेरे जाने कितने किस के मन हैं मैले । क्या राजा ..... क्या रंक....... बदल न पाये कोई भी दर्पण के ढ़ंग मैं भी दर्पण बनना चाहू सब को उनका रूप दिखांऊ फिर ये विचार अपने मन मैं लाऊं बोले सभी कि दर्पण...कभी झूठ न बोले पर अब तक उसके सच से कौन भला डोले..