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71साल (भाग-८)8

71साल (भाग-8) घर में खामोशी का माहौल था ...रामनरेश दिल पर हाथ रखे बैठे थे... पास में दोनो लड़कियां मां..बेटा थे। बड़ी लड़की दूसरे कमरे की चौखट पर खड़ी थी .उस जगह जहां से उस कमरे की सारी आवाज़े आसानी से सुनी जा सके जहा परिवारवाले बैठे थे। कुछ देर तक घर मे सांसे, जलती बुझती टूयब लाइट और पंखे की आवाज़ के सिवा कुछ नहीं सुनाई दे रहा था... किसी की हिम्मत नही हो रही थी की रामनरेश से कुछ पुछें...धीरे से रामनरेश की पत्नी बोली अरे बताऊ क्या कहा भाई ने ... कुछ देर तक रामनरेश चुप रहे फिर बोले लड़के वालों ने मना कर दिया .... सब के मुंह से एक साथ निकला मना कर दिया ....पर क्यों.... रामनरेश से सारी बात बताई.... शादी हमारे समाज मे कितनी अहमियत रखती है ..हर एक संबध जोडने के लिए हम कितने उतावले होते हैं ..हर खुशी हमारी उसी के आसपास रहती है ..हर पल हम उसी सपने के साथ जीते है... औऱ लडकी का ब्याह मानो एक पहाड अपने सिर में लादे हुए हो ... फिर रिश्ता टूट जाना तो किसी अपऱाध से कम नही.. वो सज़ा जिसमें आंसू और मातम से ही पुरसा दिया जा सके.. न आसू और न ही मातम रामनरेश के घर वालों के लिए नये नहीं थे ..क्यों कुछ ...