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इस शाम ऐसे ही

मुझे हर बार एक बात का ग़म है मुझे हर रात उस उस बात का ग़म है.. सुब होते ही खो जाते हैं जब अपने मुझे बिखरे हुए गुलिस्तां का ग़म है सजो न पाया मैं कोई रिश्ता मुझे अपनो को, खोने का ग़म है.. ग़म न करो ऐ ग़मगीन हैदर इस दुनिया को तुम्हारे आने का ग़म है.।।

बस ऐसे ही

बस ऐसे ही क्या खबर कैसे मौसम बदलते रहे । धूप में हमको चलना था चलते रहे । शमा तो सिर्फ रातों में जलती रही । और हम हैं दिन रात जलते रहे ।। ( डॉ सागर आज़मी) कली की आंख में,फूलों की गोद में आंसू खुदा न दिखलाये ऐसी बहा की सूरत।। तेरी तलाश में ये हाल हो गया मेरा । न दिन में चैन है, न शब में करार की सूरत।।