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मौला का घोड़ा...

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मौला का घोड़ा... मास्टर हुसैन साहब जब फतेहपुर से दिल्ली आये तो नौकरी के साथ मौला हुसैन की अज़ादारी का भी बंदोबस्त लेकर आये अपनी बिरादरी के लोगों को खोजा और रहने की जगह ली और एक इमामबाड़ा तामिर कराया।हर साल मोहर्रम के बाद सफर के महिने में एक जुलूस निकालते जिसमें अलमओं के साथ ज़ुलजुना भी होता । वक्त के साथ आबादी और आस्था भी बढ़ती गई और साथ में बढ़ती गई रंजीश और नफरत। उन्ही के बिरादरी के लोगों की उन्ही के लिए। इसकी वजह भी इमामबाड़ा और जुलूस ही था । साल भर सब ठीक ठाक चलता लेकिन जैसे ही मोहर्रम का चांद निकलता उसके के साथ नफरत की और जलन की दिवारें खिंच जाती ।ग़मे हुसैन के आंसू के साथ न जाने असद ने कहां से जगह बना ली ये किसी को नहीं मालुम। सब से अच्छा और दूसरे से बेहतर हमारे मौला, इसकी होड़ सी लग जाती। मुझे लगता है धर्म का इस्तेमाल सब अपनी सुविधा और सहुलियत के हिसाब से करते हैं ।अल्लाह की किताब अल्लाह के लोगों और खुद अल्लाह मात्र बातों और आदर्शो की तरह हो गया वैसे ही जैसे आज की हर राजनीतिक पार्टीओं ने अपने पुराने लोगों और विचारकों को दिवारों और पुण्यतिथी तक महदूद कर के छोड़ दिया है । कहते है...