आस
आस वो जो खुशियों का एक दीपक बन कर मेरी ज़िन्दगी में आया था । शायद कल्पनाओं का एक साया था भूल गया था मैं जिन्दगी के .... हर दुख़ ,हर ग़म ,हर तंनहाई.... अंजान कर दिया था .... उसने मुझे ग़मों से, परिचित कर दिया था उसने मुझे गैरो से कितना खुशनुमा झोका बन कर आया था ...... लेकिन जीवन केवल सुखों का पल थोड़ी है जब चाहा मैने अपनाना उसे .... मन के एक कोने चाहा बिठाना उसे दूर बहुत दूर चला गया वो .... मुस्कुराहट भी मेरी साथ ले गया वो ... कितना रोया कितना छटपटाया था मैं... शायद कभी तो हाथ आयेगा वो ... लेकिन उसे न आना था न ही वो आया था वो तो एक साया था ... हां वो तो एक साया था .... मेरा मन ही पागल था जो उसे पकड़ने को भरमाया था क्या कभी समुद्र की लहरों से रेत के घरौंदे बचे या फिर कभी सपने भी हक़ीक़त हुये हैं तो फिर साया कैसे हाथ आता ... हां वो सिर्फ साया था .. सिर्फ साया था ... साया ही था पर ज़िन्दगी नहीं मानती हम नहीं रुकते हम साये के साथ ही जीते है सपनों मे ही रहते हैं ... जानते हुये भी उसी ओर चलते है जिस तरफ मंज़िल का कोई नामोनिशान नहीं ... क्यो ...भला क्यों .... शायद एक आस के लिये ... आस हां उम्म...