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लो फिर बात चली

लो फिर बात चली एक हल्की हवा फिर चली लो तेरी बात फिर चली ।। हर झोका एक एहसास जगाता है हर बार एक तमन्ना फिर जग जाती है कोई कुछ कहता है पर मन तेरे बारे मे ही सोचता है।। चलता हूं गुज़रता हूं जब उन बीते रास्तों से हर तरफ वो पल नज़र आता है।। सादगी थी, मसूमियत थी हम में न जाने कौन सी रौनक थी ..।। वो ही तारीख वो ही दिन, पर साल बदलते देखे हमने वक्त के साथ सारे, रिश्ते बदलते देखते ..।। फिर जब भी कोई ज़िक्र हो जाता है ... एक एहसास फिर उठ जाता है... शायद तू भी वो ही सोचता होगा शायद तुझ को भी वो ही याद आता होगा...।। लो फिर बात चली एक हल्की हवा फिर चली लो तेरी बात फिर चली ....।।

मां.....

मां..... क्यों चली गई बहुत याद आती है आंख अक्सर भर जाती है कुछ कहूं ,कुछ करूं तेरी शबी नज़र आती है आज मलाल है तेरे जाने का तेरे लिए कुछ न कर पाने का मैं नाकारा रहा निक्मा रहा फिर भी तेरा दुलारा रहा.. वो शब्द अब भी गूंजते है मैं चली जाऊंगी जब पता चलेगा वो शायद तब मज़ाक था पर उस हकीक़त का एहसास अब हो रहा है... सच मैं मां बहुत याद आती है शान....

तेरे जाने के बाद

तेरे जाने के बाद बदल गए हम बदल दी हर तस्वीर बदल दी हर याद बदल दी हर बात बदल दिए रास्ते बदल दिए चौहराए बदल दी हर गली बदल दिए हर नुक्कड बदल दी हर पसंद बदल दिए जो थे संग बदल दिया अपना रंग बदल दिया अपना ढंग बदल दी महफिल बदल दिए उसूल बदल दिया इमान बदल दिया फरमान बदल दिया माकान बदल दिया भगवान फिर भी रहे गया अरमान काश तुम होते तो मै न बदलता तेरे जाने के बाद शान....

सीवीआई सरकार की रखेल (भाग-1)

सीवीआई सरकार की रखेल (भाग-1) शायद कई लोगों को मेरी भाषा पर गुस्सा आए ..मेरे शब्दों से एतराज़ हो ... ये शब्द सख्त ज़रूर हैं लेकिन हैं सच... सीबीआई बनी थी सरकार के काम काज पर नज़र रखने के लिए..उसमें हो रहे भ्रष्टाचार को रोकन के लिए ..पर सीबीआई की हालत देख कर यही लगता है की सरकार तय करती है सीबीआई कैसे और किस तरह से काम करे...सीबीआई की ऑटोनॉमी की बातें खोखली और बेमानी लगती है.. आईये उदाहरणों से अपनी बात को पेश करते हैं...औऱ चलते हैं 6दिंसबर 1992 बाबरी मस्जिद गिरा दी गई...और बीजेपी और वीएचपी के कई बड़े नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज हुआ. जिनमे लाल कृष्ण आडवाणी ,मुरली मनोहर जोशी ,उमा भारती और विनय कटियार के नाम सामने आए.. विशेष सीबीआई अदालत में मामले चलते रहे,एनडीए की सरकार बनी और आडवाणी जी गृह मंत्री बन गए ...और फिर शुरू हुआ खेल .. जब आरोप तय होने थे उस समय के मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने कहे दिया अगर मुझ पर आरोप तय हुए तो मैं इस्तीफा दे दूंगा..ये बात आडवाणी पर दबाव बनाने के तौर पर कही गई..अगले दिन आडवाणी जी छूट गए और बाकी सब नप गए...। पूरे देश में आडवाणी के छूटने पर ह...

सरकारी आदमी काम क्यों नहीं करता ...

सरकारी आदमी काम क्यों नहीं करता ... आज भी किसी सरकारी दफतर जाते वक्त रूह कांप जाती है ..एक डर और खौफ अंदर होता है न जाने क्या होगा ... मुझे पता है इस लेख से कुछ नहीं होगा ... 62 साल से कुछ नहीं हुआ तो अभी कुछ होगा इसकी मुझे उम्मीद नहीं है पर मैं इसे अपना फर्ज़ समझता हूं की इस बात को आप सब के सामने लाया जाए.. शायद सरकारी महकमे में जाने से पहले हम मानसिक रूप से तैयार रहें.. यहां भाई कुछ भी काम एक बारी में बिना रिश्वत दिए बिना बहस और परेशानी लिए..और बिन ब्लड परेशर की गोली खाए नहीं हो सकता । आज ये बात मेरे अकंल ने मुझे बताई जिन की उम्र देश की आज़ादी के बराबार ही है...दुख की बात ये है..ये उस महकमें की बात है.. जो दावा करता है की वो आपकी परेशानी और दुख में आपके साथ है और रहेगा ..जी एलआईसी (LIC).. अंकल ने रिटार्यरमेंट से पहले एलआईसी का यूलीप प्लान लिया था .15,000 हज़ार सलाना का .. जिसके भुगतान का आज आखिरी साल था और तारीख भी आखिरी थी ... तो अंक्ल ठीक समय से घर से निकल पड़े .. दिल्ली के जगतपुरी के दफ्तर पहुचें तो पता चला की यहां से ऑफिस हटा दिया गया है ...जिसकी सूचना उन्होने अपने ग्राहकों को न...

जंसवत शहीदे -आज़म

जंसवत शहीदे -आज़म जसवंत सिंह की बीजेपी से विदाई हो गई है और विदाई भी ऐसी वैसी नही पार्टी ने बड़ा ही बेआबरू कर के उन्हे निकाला हैं । ऐसा सलूक तो आज के ज़माने में किसी स्कूली बच्चे के साथ भी नही किया जाता है। लेकिन जसवंत सिंह के साथ बीजेपी ने किया और जसवंत सिंह ने उसे बर्दाशत भी कर लिया, आप सोच रहे होंगे कि बर्दाशत ना करते तो और करते क्या , तो आप भी सही हैं। बीजेपी की मुख़ालफत करने वाले जसवंत सिंह के साथ हुए ऐसे सलूक पर बीजेपी को कोसने में कोई कोर कसर नही छोड़ रहे। अगर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान कि अगर बात की जाए तो वहा के मीडिया ने तो जसवंत को शहादत का दर्जा तक दिलवा दिया , एक ऐसा शहीद जिसे सच सामने लाने के लिए उसके अपनों ने ही बलि चढ़ा दी । ये बात भी खूब ज़ोर शोर से उठाई जा रही है कि जसवंत की संघ से नज़दीकी ना होना भी उनकी पार्टी से विदाई की वजह बनी । लेकिन एक बात जो कोई समझ नही रहा कि जसवंत को दरअसल उनका लालच ले डूबा। ..... ज़रा सोचिए, जसवंत सिंह क्या आपको इतनी कच्ची गोलियां खेले हुए लगते हैं कि जिस पार्टी और विचारधारा के लिए उन्होंने एक उम्र गुज़ार दी उसे समझने में उनसे इतनी बड़ी गल्ती ह...

कुछ अधूरे काम बचें...

कुछ अधूरे काम बचें... उम्र साठ साल .. नौकरी से मुक्त बच्चों की ज़िम्मेदारियों से रिहा.. न कर्ज़ न कोई फर्ज़.. जी लूं तो ठीक.. न रहूं तो भी सही.. कोई आए तो अच्छा न मिले तो बेहतर.. भगवान की शरण में तीर्थ स्थानों में मंदिर में, दरगाहों में इस से, उस से जहा और जिससे वक्त गुज़र जाए वो बेहतर पर कुछ पूरा करने की चाहत में कुछ हसरतों के एहसास में उम्र के कुछ दिन बचें हैं.. कुछ अधूरे काम बचें हैं.. कभी किसी का दिल तोड़ा कभी कोई रिश्ता छोड़ा कभी इस फिराक में कभी उस जुगाड़ में इससे लिया उसको दिया वहां अच्छा बना तो वहां बुरा बना किसी का भला किया तो किसी की भुला दिय़ा .. ज़िन्दगी के इस मुकाम पर कुछ अधूरे काम पड़े हैं... मां की गोद से कब ज़मी पर चला बाप की उंगली से कब छूट गया जाने किस रिश्तो से घीरा किस बंधन में बंधा .. सोचता हूं मैं क्या मैने सब कुछ पूरा किया .. सागर की लहरों में मोतियों की खोज से ज़िन्दगी के इस पल में कुछ अधूरे काम बचें है....... शान.....