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खुशी अपनो के साथ

खुशी अपनो के साथ सुबोत ज़िन्दगी की रफतार से तेज़ चल रहा है ...वक्त से पहले सब कुछ हासिल करने की कोशिश..और इसमें ग़लत क्या है । दुनिया का ये दस्तुर है कि अगर आप वक्त के साथ और वक्त के आगे नहीं चलेंगे तो आप पीछे छूट जाएगें... कई लोग ये सोच कर संतुष्ठ हो जाते हैं कि भई हमने तो सब कुछ पा लिया ।हम तो अपने मुकाम पर पहुच गए..शायद यहीं से उनकी भूल होती है ..इसलिए आज जो, मैं जिस मुकाम पर पहुचां हूं। मुझे उससे आगे जाना है और अपनी कम्पनी को भी आगे लेकर जाना है .और आप सब जो काम कर रहे हैं उनको भी ... सुबोत ने जैसे ही अपनी बात खत्म की .वैसे ही सारा हॉल तालियों की आवाज़ से गूंज उठा कैमरे की रोशनी और रिपोर्टरों के सवाल ..सब एक साथ टूट पड़े .... किसी पत्रकार ने पुछ ही लिया इतनी जल्दी इतना सबकुछ ..क्या कुछ छुटा नही, क्या कुछ रहे तो नहीं गया ...किसी का साथ किसी का प्यार... सुबोत मुस्कुरा दिया पर पहली बार उसकी मुस्कुराहट में चिता छलक रही थी । आज उसका न जाने क्यों मन जल्दी घर जाने के लिए करने लगा ..आज न जाने कितने बरसों बाद वो शाम को घर की तरफ जा रहा था ...उसे अपना शहर कितना बदला बदला दिख रहा था ...पंछी...

एड्सवाली औरत.. सच्ची घटना....

राजस्थान के शहर अजमेर से लगभग 35 km दूर बसा एक छोटा सा गाव नंदलाला.जहां काली और उसके परिवार की ज़िन्दगी हमेशा के लिये अचानक बदल गई। 42साल की काली पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा जब उसे पता चला की उसका, एचआईवी टेस्ट पॉज़िटिव है ,इससे साल भर पहले ही काली के पति की एचआईवी की वज़ह से मौत हुई थी ।काली का पति ट्रक ड्राईवर था और अपने काम के सिलसिले मे ज्यादातर बाहर रहता था । गांव के ज्यादातर आदमी ट्रक ड्राइवरी के पेशे से जूडे हुये हैं और हाईवे ही उनका घर है ।गांव में करीव 300 परिवार हैं और हर परिवार से एक आदमी ट्रक ड्राइवरी से जुड़ा हुआ है । ट्रक चालक अपने लंबे सफर के दौरान कई जगह खाने पीने और आराम के लिये रुकते हैं । इसी दौरान इनमे से कुछ कि नज़दीकियां वैश्याओं से भी हो जाती हैं और इस संभावना से इंकार नही किया जा सकता कि काली का पति अपने ऐसे ही किसी संम्बध की वजह से एचआईवी संक्रमण से ग्रस्त हुआ।.और उसी से ये संक्रमण काली में आ गये। काली के पति की मौत को दो साल हो गये हैं । एचआईवी से झूझ रही काली अपने दो बच्चों के साथ बमुशकिल अपनी ज़िन्दगी थोड़ी बहुत आमदानी के ज़रिये गुज़ार रही है । काली दो ...

शाह को मात

शाह को मात गुजरात सरकार के गृहमंत्री अमित शाह को मात मिल चुकी है ..कोर्ट ने उनकी अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी खारीज कर दी है ।गुजरात हमेशा से बीजेपी के दिल से जुड़ा हुआ है । मोदी हो या फिर उनका कोई भी मंत्री बात जब गुजरात की उठती है तो दिल्ली तक पहुंच ही जाती है.. और दिल्ली में बैठे मोदी के एजेंट मामले को अलग राह पर मोड़ देते हैं और केन्द्र को दोषी करार देने में जुट जाते हैं... हर किसी की चार्जशीट पर बवाल करने वाली बीजेपी को अब वातावरण इतना प्रदुषित लग रहा है कि उन्होने प्रधानमंत्री के दिए भोज में भी जाने से इंकार कर दिया.. सही है मोदी से ही यहां बैठे बीजेपी के लोगो की रोटी चल रही है तो मोदी या फिर मोदी की सरकार पर कोई भी आंच आए तो खाना खाने से इंकार कर दिया जाता है .. मनमोहन सिंह तो पराए हैं मोदी के चक्कर में तो अपने सहयोगी नितिश के भी भोजन को मना कर चुके हैं...जब नितिश ने कहा था मोदी को छोड़ कर सब भोजन में आ सकते हैं... पर मोदी को कैसे छोड़े बीजेपी कब तक पाप और मोदी के बोझ को बीजेपी उठाएगी.. इस प्रदुषित हुए वातावरण को किसी को तो साफ करना ही होगा...

छछुंदर के सर पर चमेली का तेल

छछुंदर के सर पर चमेली का तेल हालत देश की हुई बुरी ग़रीबी मंहगाई खूब बढ़ी।। चर्चा हो गया ये आम मेहनत का मिलता नहीं कोई दाम ।। चापलूसों ने किया देश का बंटाधार निकम्मो के सिर पर पहना कर ताज।। समझ में नहीं आता ये सारा खेल क्यों लगता है हमेशा छछुंदर के सर पर चमेली का तेल।।

आंधी

एक आंधी कुछ इस तरह से आती है साथ अपने गर्द और राख लाती है पीछे अपने अंधकार और मातम छोड़ जाती है जिसने देखा वो थर्ऱा गया जिसने सुना वो कांप गया जो गया वो लौट कर न आया जो बचा वो लौट कर जा न सका उस मंज़र को शब्दों मे बयां कैसे करूं उस रात को कलम से कैसे लिखूं रोने की आवाज़े शोर में खो गईं चीख पुकारे हवाओं मे उड गई वो आंधी इस बार सब कुछ ले गई

असगर नदींम सरवर की नज्म

असगर नदींम सरवर की नज्म भारत पाक रिश्ते पर मुसाफ़िर साठ बरसों के अभी तक घर नहीं पहुँचे कहीं पर रास्ते की घास में अपनी जड़ों की खोज में तारीख़ के घर का पता मालूम करते हैं मगर तारीख़ तो बरगद का ऐसा पेड़ है जिसकी जड़ें तो सरहदों को चीर कर अपने लिए रस्ता बनाती हैं मुसाफ़िर साठ बरसों के बहुत हैरान बैठे हैं... मुसाफ़िर साठ बरसों के अभी तक घर नहीं पहुँचे कहीं पर भी नहीं पहुँचे. कि सुबहे-नीम वादा में धुंधलका ही धुंधलका है कि शामे-दर्दे-फ़ितरत में कहीं पर एक रस्ता है नहीं मालूम वो किस सम्त को जाकर निकलता है मुसाफ़िर साठ बरसों के बहुत हैरान बैठे हैं.

बरसात कुछ लाती है

बरसात कुछ लाती है अकसर बरसात में वो घड़ी याद आती है एक मां अपने बेटे के साथ जाल लेकर आती हैं सुमंद्र के किनारे लहरों में वो जाल फेंके खड़े रहते हैं गिरती बूंदों से अपनी किस्मत की दुआ करते हैं इस बरसात में झोली अपनी भर जाएगी ये बारिश मेरे दुख, बहा ले जाएगी लहरें भी झूम के मस्त होती है हर बहाव में कुछ न कुछ भेजती है.. कोई बचता है कोई गीत गाता है कोई देख कर ही लुत्फ उठाता है ।। मुझे एक और घड़ी याद आती है कड़ी- बल्ली ,पत्थर की छत टपकती है घर की बिल्ली दुबक कर कहीं बैठती है कमरो में हर वक्त छतरी खुली रहती है मेरी चप्पल अकेले ही सैर पर निकल जाती है कोई बचता है कोई गीत गाता है कोई देख कर ही लुत्फ उठाता है ।। मुझे एक और घड़ी याद आती है हाथों मे हाथ डाले कोई चलता है कोई इधर चलता है कोई उधर चलता है पायचें उठाए ,जूते लिए बचकर कोई निकलता फिर भी मोटर गाड़ी छीटे मार कर भाग जाती है न जाने तब गाली कहां से मुंह में आती है हर बार बरसात कुछ लाती है कोई बचता है कोई गीत गाता है कोई देख कर ही लुत्फ उठाता है ।।